योगी सरकार में सुरक्षित नही रहे पत्रकार, ख़बरों से ख़ौफ़ क्यूँ।

अपना एनसीआर अपनी पुलिस होमपेज स्लाइडर

कानपुर : पत्रकारिता अगर लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है तो पत्रकार इसका एक सजग प्रहरी है. देश को आज़ादी दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली पत्रकारिता आज़ादी के बाद भी अलग-अलग परिदृश्यों में अपनी सार्थक ज़िम्मेदारियों को निभा रही है. लेकिन मौजूदा दौर में अब पत्रकारिता दिनोंदिन मुश्किल बनती जा रही है. जैसे-जैसे समाज में अत्याचार, भ्रष्टाचार, दुराचार और अपराध बढ़ रहा है, वहीं अब पत्रकारों पर हमले की घटनाएं भी बढ़ रही हैं.

कवरेज करने गए पत्रकार से भिड़ी पुलिस

उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले में पुलिस द्वारा एक पत्रकार से बदसलूकी का मामला सामने आया है. राजकीय बालगृह (बालिका) की कवरेज कर रहे पत्रकार के साथ पुलिस ने ना केवल गाली-गलौज की बल्कि, उसको हवालात में बंद कर के बुरी तरह मारा-पीटा भी. स्वरूपनगर थाने में मौजूद सिपाही विनोद कुमार, जितेंद्र कुमार, विपिन, चौकी इंचार्ज राम चौहान, चौकी इंचार्ज यशवंत सिंह और थाने के मुन्शी ने हिन्दी ख़बर टीवी के पत्रकार अंकित सिंह व वीडियो जॉर्नलिस्ट शुभम शुक्ला को हवालात में बंद कर बुरी तरह पीटा.

पिट रहा लोकतंत्र का प्रहरी

भारत को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने का गौरव प्राप्त है. पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ और पत्रकारों को लोकतंत्र का प्रहरी कहा जाता है. जहां एक तरफ पत्रकारिता लोगों में जागरूकता पैदा करके लोकतंत्र को मज़बूती प्रदान करता है तो वहीं लोकतंत्र के दूसरे स्तंभों यानी कार्यपालिका और न्यायपालिका पर भी नज़र रखता है. कानपुर जनपद के पत्रकारों को अपना काम ईमानदारी से करने का इनाम ज़ख्म की शक्ल में मिले तो इससे न सिर्फ देश की कानून व्यवस्था सवालों के घेरे में आ जाती है बल्कि यह लोकतंत्र के लिए भी ठीक नही है.

अपना उत्तर प्रदेश के लिए कानपुर से वरिष्ठ संवाददाता फैज़ान हैदर की रिपोर्ट

 

 

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *